बचपन का शहर
आज रात
बर्षों बाद चाँद को देखा था
उस चाँद को,
जिससे रिश्ता है
बचपन की यादों का
अनोखा अनुभव है
साथ गुजरे रातों का
आज रात
बर्षों बाद चाँद को देखा था
उस चाँद को,
जिससे रिश्ता है
बचपन की यादों का
अनोखा अनुभव है
साथ गुजरे रातों का
ऐसा लगता है ये कल की बात है,
गुज़रे ज़माने की नहीं ये तो सुबह की बात है,
ऐसा लगता है, ये कल की बात है…
जनवरी 22, 2005 को एक समय की मशहूर फिल्म अदाकारा परवीन बाबी की निधन और उस वक्त की परिस्थिति पर मेरे द्वारा उद्विग्रित रचना.
धोखा देता है ये वक्त ! Read More »
सहयोगी कर्मचारी के सेवा निवृति विदाई समारोह के दौरान मन में उत्पन्न उस समय का एक दृश्य.
सेवा निवृति के बाद व्यक्ति क्या सोचता होगा ? अपेक्षा और उपेक्षा की दो संभावित भावनाओं का चित्रण.
व्यक्ति जब रिटायर होता है Read More »
कविता कुछ और नहीं दिल में दबी भावनाओं का ज्वार है,
परतंत्र घेरों में उत्पन्न स्वतंत्र संबंधों का अपरिपक्व दास्तान है .
एक व्यक्ति,
हर रोज सुबह सबेरे,
एक नियत समय पर,
अपने अभीष्ट देव के सामने,
हाथ जोड़कर नतमष्तक होता है.
क्या भाग्य कर्म से ऊपर है ?
क्या भाग्य कर्म से ऊपर है ? Read More »
अक्सर व्यक्ति वर्तमान परिस्थितियों के गिरफ्त में इस प्रकार आ जाता है कि उसकी सभी इक्क्षाएं क्षीण होती नजर आती हैं. उम्र गुजरती जाती है और इक्षाएं इन्तजार करती रहतीं है.